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हरियाणा के कच्चे कर्मचारियों को बड़ी राहत! सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 2014 की नियमितीकरण नीतियों पर सरकार ने शुरू की कार्रवाई

16 जून और 18 जून 2014 की नीतियां सुप्रीम कोर्ट ने वैध मानीं, 7 जुलाई 2014 की नीति को बताया अवैध; पात्र कर्मचारियों की होगी जांच

TAP News की पड़ताल में सुप्रीम कोर्ट के मूल फैसले से यह स्पष्ट है कि मामला दो अलग-अलग श्रेणियों में बंटा हुआ है—16 और 18 जून 2014 की पात्रता-आधारित नीतियां वैध हैं, जबकि 7 जुलाई 2014 की बाद की नीति अवैध घोषित की गई है।

चंडीगढ़ | TAP News / THE ASIA PRIME

हरियाणा में लंबे समय से अनुबंध, तदर्थ और दैनिक वेतन आधार पर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद नई उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 को Madan Singh and Others vs State of Haryana मामले में हरियाणा सरकार की वर्ष 2014 की नियमितीकरण नीतियों की वैधता पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने 16 जून 2014 और 18 जून 2014 की नियमितीकरण अधिसूचनाओं को वैध माना, जबकि 7 जुलाई 2014 की अधिसूचनाओं को मनमानी और अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक 16 जून 2014 की अधिसूचना ग्रुप-B के ऐसे कर्मचारियों से संबंधित थी, जो निर्धारित शर्तों को पूरा करते थे। इसी तरह 18 जून 2014 की अधिसूचना ग्रुप-C और ग्रुप-D के बचे हुए कर्मचारियों के नियमितीकरण से जुड़ी थी।

इन दोनों नीतियों के तहत नियमितीकरण के लिए केवल लंबे समय से नौकरी करना ही पर्याप्त नहीं था। कर्मचारी का 28 मई 2014 तक कम से कम तीन वर्ष की सेवा पूरी करना और सेवा में बने रहना, संबंधित पद के लिए निर्धारित योग्यता रखना तथा नियुक्ति का स्वीकृत रिक्त पद (sanctioned vacant post) पर होना जैसी शर्तें महत्वपूर्ण थीं। नियमितीकरण के समय भी संबंधित पद का स्वीकृत होना जरूरी था।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन परिस्थितियों में संबंधित कर्मचारियों की नियुक्तियां पूरी तरह अवैध नियुक्तियां नहीं थीं और 16 जून तथा 18 जून 2014 की नीतियों को केवल इस आधार पर रद्द करना उचित नहीं था। इसलिए इन नीतियों के तहत पात्र कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ मिल सकता है, लेकिन इसके लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा पात्रता का सत्यापन जरूरी रहेगा।

7 जुलाई 2014 की नीति क्यों रद्द हुई?

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 7 जुलाई 2014 की नीति है। इस नीति में ऐसे कर्मचारियों को भी नियमित करने का रास्ता बनाया गया था जिनकी नियुक्ति सार्वजनिक विज्ञापन और इंटरव्यू जैसी नियमित चयन प्रक्रिया के बिना हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को संवैधानिक भर्ती प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना। कोर्ट के अनुसार सार्वजनिक रोजगार में निष्पक्ष और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया जरूरी है। इसी आधार पर 7 जुलाई 2014 की नियमितीकरण अधिसूचनाओं को मनमाना और अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया गया।

हालांकि कोर्ट ने उन ग्रुप-B, C और D कर्मचारियों को तत्काल नौकरी से हटाने का आदेश नहीं दिया, जिन्हें 7 जुलाई 2014 की नीति का लाभ मिल चुका था और जो अभी भी सेवा में हैं। ऐसे कर्मचारियों को विशेष परिस्थितियों में सेवा में जारी रखने का निर्देश दिया गया, लेकिन उन्हें संबंधित पद के न्यूनतम वेतनमान पर रखने की बात कही गई।

अब हरियाणा सरकार क्या करेगी?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब मुख्य सवाल सरकार द्वारा पात्र कर्मचारियों की पहचान और सत्यापन का है। आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए 11 अगस्त 2026 के हरियाणा सरकार के पत्र के अनुसार संबंधित विभागों को पात्र कर्मचारियों की स्थिति की जांच कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि हरियाणा के प्रत्येक कच्चे कर्मचारी को स्वतः पक्का कर दिया जाएगा। नियमितीकरण उन्हीं कर्मचारियों को मिलेगा जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्य 16 जून और 18 जून 2014 की नीतियों में निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं।

कर्मचारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात

इस पूरे मामले में तीन तारीखें सबसे महत्वपूर्ण हैं—

16 जून 2014: ग्रुप-B से संबंधित नियमितीकरण नीति — सुप्रीम कोर्ट ने वैध मानी।

18 जून 2014: ग्रुप-C और D से संबंधित नीति — सुप्रीम कोर्ट ने वैध मानी।

7 जुलाई 2014: ग्रुप-B, C और D के लिए बाद की नियमितीकरण नीतियां — सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें मनमाना और अवैध माना।

इसलिए कर्मचारियों को केवल यह देखकर दावा नहीं करना चाहिए कि वे लंबे समय से नौकरी कर रहे हैं। नियुक्ति का आधार, स्वीकृत पद, निर्धारित योग्यता, सेवा अवधि और संबंधित नीति की शर्तों की जांच जरूरी होगी।

क्या कर्मचारियों को प्रमोशन और दूसरे सेवा लाभ भी मिलेंगे?

यह पहलू संबंधित कर्मचारी की पात्रता और सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले आदेश पर निर्भर करेगा। सुप्रीम कोर्ट का मूल फैसला मुख्य रूप से 2014 की नीतियों की वैधता और उनसे जुड़े कर्मचारियों के अधिकारों पर है। इसलिए हर कर्मचारी के मामले में समान रूप से पदोन्नति, वरिष्ठता, वेतन बकाया या अन्य परिणामी लाभ मिलने का दावा करना उचित नहीं होगा; इनका निर्धारण संबंधित नियमों और सक्षम प्राधिकारी के आदेश के अनुसार होगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हरियाणा के उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो 2014 की 16 जून और 18 जून की नियमितीकरण नीतियों के तहत पात्र हो सकते हैं। लेकिन इसे “हर कच्चा कर्मचारी पक्का होगा” के रूप में समझना सही नहीं है। पात्रता की शर्तें पूरी करना और सरकारी सत्यापन इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।

स्रोत: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, Madan Singh & Others vs State of Haryana & Others, निर्णय दिनांक 16 अप्रैल 2026, 2026 INSC 379

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