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मौत के सामने भी नहीं झुकी भारत की ‘वीर बेटी’: नीरजा भनोट के बलिदान की वो दास्तां, जिसने पूरी दुनिया को रुला दिया

मर जाऊंगी लेकिन भागूंगी नहीं: अपनी जान देकर 360 यात्रियों को मौत के मुंह से निकाल लाई थी 23 साल की जांबाज नीरजा

कौन थीं नीरजा भनोट? जिसने 23 साल की उम्र में आतंकवादियों की गोलियों के सामने सीना तान दिया। 360 लोगों की जान बचाने वाली उस जांबाज फ्लाइट अटेंडेंट की कहानी, जिसने फर्ज के लिए मौत को गले लगा लिया। देखिए TAP NEWS / THE ASIA PRIME की विशेष श्रद्धांजलि।

नई दिल्ली ब्यूरो चीफ सतबीर जांडली (TAP NEWS / THE ASIA PRIME): इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय की धूल में दबने के बजाय और भी चमकदार होकर उभरते हैं। ऐसा ही एक नाम है—नीरजा भनोट। आज की पीढ़ी के लिए नीरजा केवल एक नाम नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्यनिष्ठा और निस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च उदाहरण हैं। महज 23 साल की उम्र में नीरजा ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े शूरवीर भी नहीं कर पाते।

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मॉडलिंग की चमक छोड़ चुना फर्ज का रास्ता

​7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ में जन्मी नीरजा का पालन-पोषण मुंबई में हुआ। वे बेहद खूबसूरत थीं और विज्ञापनों में एक सफल मॉडल के रूप में पहचान बना रही थीं। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही चुना था। 1985 में वे पैन एम (Pan Am) एयरवेज में फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में शामिल हुईं। उनकी माँ ने एक बार मजाक में या शायद डर के कारण उनसे कहा था कि “अगर कभी विमान का अपहरण हो जाए, तो भागकर अपनी जान बचा लेना।” तब नीरजा ने जो जवाब दिया, वह आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देता है। उन्होंने कहा था— “मम्मी, मर जाऊंगी लेकिन भागूंगी नहीं।”

5 सितंबर 1986: वो काली सुबह

​मुंबई से न्यूयॉर्क जा रही ‘पैन एम फ्लाइट 73’ कराची एयरपोर्ट पर रुकी थी। सुबह के करीब 6 बजे थे। नीरजा इस फ्लाइट की सीनियर पर्सर थीं। अचानक चार हथियारबंद फिलिस्तीनी आतंकवादी सुरक्षाकर्मियों के भेष में विमान में घुस आए। नीरजा ने तुरंत खतरा भांप लिया और फुर्ती दिखाते हुए ‘हाइजैक कोड’ का इस्तेमाल किया। उनके इस अलर्ट की वजह से विमान के तीनों पायलट ओवरहेड हैच से भागने में सफल रहे, जिससे विमान जमीन पर ही रुक गया और आतंकवादी उसे कहीं और नहीं ले जा सके।

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17 घंटे की दहशत और नीरजा का धैर्य

​आतंकवादियों के पास अब कोई पायलट नहीं था, इसलिए उन्होंने नीरजा को ही बातचीत का जरिया बनाया। विमान में 380 यात्री और 13 क्रू सदस्य थे। 17 घंटों तक मौत साए में नीरजा ने न केवल यात्रियों को शांत रखा, बल्कि उन्हें सैंडविच और पानी भी दिया। जब आतंकवादियों ने अमेरिकियों को मारने के लिए पासपोर्ट इकट्ठा करने को कहा, तो नीरजा ने बुद्धिमानी दिखाते हुए अमेरिकी पासपोर्ट्स को सीटों के नीचे छिपा दिया और कुछ को कचरे के पाइप में फेंक दिया। नतीजा यह हुआ कि विमान में मौजूद 44 अमेरिकियों में से 42 की जान बच गई।

अंतिम क्षण: जब फर्ज के लिए दे दी जान

​17 घंटे बीतने के बाद विमान की बिजली गुल हो गई और आतंकवादियों का सब्र टूट गया। उन्होंने अंधाधुंध फायरिंग और ग्रेनेड फेंकना शुरू कर दिया। नीरजा ने हिम्मत नहीं हारी और इमरजेंसी एग्जिट दरवाजा खोल दिया। वे चाहतीं तो सबसे पहले बाहर निकल सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे एक तरफ खड़ी होकर यात्रियों को बाहर धकेलने लगीं।

​अंत में, जब वे तीन छोटे बच्चों को बाहर निकालने में मदद कर रही थीं, तभी एक आतंकवादी ने उन्हें देख लिया। उसने नीरजा को उनके बालों से पकड़ा और बेहद नजदीक से गोली मार दी। अपने 24वें जन्मदिन से महज दो दिन पहले, नीरजा कराची के रनवे पर शहीद हो गईं।

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सम्मान जो नीरजा के नाम से अमर हुए

​नीरजा भनोट के इस अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया। वे यह सम्मान पाने वाली पहली महिला और सबसे कम उम्र की व्यक्ति बनीं। पाकिस्तान ने उन्हें ‘तमगा-ए-पाकिस्तान’ और अमेरिका ने ‘स्पेशल करेज अवार्ड’ से नवाजा।

नीरजा भनोट ने दुनिया को सिखाया कि साहस का मतलब केवल हथियार उठाना नहीं, बल्कि मौत के सामने खड़े होकर दूसरों की रक्षा करना भी है। वे चाहतीं तो जी सकती थीं, लेकिन उन्होंने चुनना पसंद किया—अपना फर्ज। आज भी नीरजा का बलिदान हमें याद दिलाता है कि इंसानियत की जीत हमेशा डर से बड़ी होती है।

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