हाथ में मोबाइल, कंधे पर जिम्मेदारी”: NDTV के पूर्व मालिक प्रणय रॉय की नई पारी; बड़े स्टूडियो को छोड़ जब जमीन पर उतरा पत्रकारिता का दिग्गज
वक्त बदला, चैनल छूटा, लेकिन जुनून नहीं! लग्जरी लाइफ छोड़ बंगाल की गलियों में माइक थामे नज़र आए डॉ. प्रणय रॉय; सोशल मीडिया पर 'असली पत्रकारिता' की नई मिसाल वायरल।

NDTV के पूर्व मालिक डॉ. प्रणय रॉय का नया अवतार। हाथ में माइक और मोबाइल लेकर बंगाल की जमीन पर कर रहे हैं रिपोर्टिंग। सोशल मीडिया पर लोग बोले— “यही है असली पत्रकारिता।”
कोलकाता/नई दिल्ली ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News) : भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता के इतिहास में डॉ. प्रणय रॉय एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने देश को चुनाव विश्लेषण और न्यूज एंकरिंग का सलीका सिखाया। कभी करोड़ों के टर्नओवर वाले मीडिया नेटवर्क NDTV के सर्वेसर्वा रहे प्रणय रॉय की एक ताज़ा तस्वीर और वीडियो ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। यह तस्वीर बताती है कि व्यवस्थाएं और मालिक बदल सकते हैं, लेकिन एक ‘सच्चा पत्रकार’ कभी रिटायर नहीं होता।
न स्टूडियो, न टेलीप्रॉम्प्टर: सिर्फ जज्बा और पत्रकारिता
हाल ही में वायरल हुए वीडियो में डॉ. प्रणय रॉय पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल के बीच जमीन पर डटे नजर आ रहे हैं। उनके एक हाथ में माइक है और दूसरे में मोबाइल फोन। न कोई भारी-भरकम ओबी वैन (OB Van) है, न बड़ा सेटअप और न ही पीछे खड़े दर्जनों कैमरामैन। वह एक साधारण रिपोर्टर की तरह लोगों के बीच जाकर उनसे बात कर रहे हैं और जमीनी हकीकत को अपने मोबाइल के जरिए रिकॉर्ड कर रहे हैं।
नौकरी और जुनून का अंतर
सोशल मीडिया पर यूज़र्स इस तस्वीर को देख कर लिख रहे हैं कि यही फर्क होता है ‘नौकरी’ और ‘पत्रकारिता’ में। प्रणय रॉय चाहते तो NDTV से अलग होने के बाद आराम से अपने घर बैठ सकते थे या किसी बड़े संस्थान में सलाहकार बन सकते थे। लेकिन उन्होंने उस रास्ते को चुना जिसे ‘ग्राउंड रिपोर्टिंग’ कहते हैं।
- व्यवस्था का बदलाव: वक्त बदला और सत्ता के समीकरणों के बीच उनका चैनल उनके हाथों से निकल गया, लेकिन उनके भीतर का पत्रकार उनसे कोई नहीं छीन सका।
- सच्चा रास्ता: यह वीडियो उन युवा पत्रकारों के लिए एक सबक है जो केवल चकाचौंध और बड़े स्टूडियो को ही पत्रकारिता समझते हैं।
बंगाल की गलियों से संदेश
प्रणय रॉय वर्तमान में बंगाल के चुनावी मिजाज को समझने के लिए गांवों और कस्बों का दौरा कर रहे हैं। उनके इस नए अवतार को देखकर लोग कह रहे हैं कि “सच्चा पत्रकार अपना रास्ता खुद बना लेता है।” चाहे संसाधन सीमित हों या परिस्थितियां विपरीत, अगर मंशा सच दिखाने की है, तो एक मोबाइल फोन भी दुनिया बदलने के लिए काफी है।
सोशल मीडिया पर मिली जबरदस्त सराहना
फेसबुक और ‘X’ पर लोग डॉ. रॉय की इस सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि प्रणय रॉय ने साबित कर दिया है कि पत्रकारिता किसी ‘ब्रांड’ या ‘लोगो’ की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी है जो समाज के प्रति होती है।
डॉ. प्रणय रॉय की यह ‘नई पारी’ भारतीय मीडिया के मौजूदा दौर में एक बहुत बड़ा संदेश है। आज जब मुख्यधारा का मीडिया अक्सर स्टूडियो की बहस में उलझा रहता है, तब एक वयोवृद्ध पत्रकार का हाथ में मोबाइल लेकर धूप में निकलना यह याद दिलाता है कि खबरें कुर्सियों पर नहीं, बल्कि सड़कों पर मिलती हैं। यह उस ‘जज्बे’ की जीत है जिसे कोई भी कॉर्पोरेट डील खरीद नहीं सकती।
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