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खड़गे से हुड्डा-तंवर की मुलाकात: क्या राज्यसभा की बिसात पर फिर ‘मोहरा’ बनेगा मेवात? कांग्रेस की ‘अनदेखी’ पर उठे गंभीर सवाल

टाइटल: मेवात ने दिया ऐतिहासिक 72% वोट शेयर, लेकिन संगठन और राज्यसभा में हिस्सेदारी 'शून्य'; तंवर-हुड्डा के नए गठजोड़ के बीच सुलगता सवाल—क्या मेवात सिर्फ वोट बैंक है या बराबर का भागीदार?

हरियाणा कांग्रेस में राज्यसभा की सीट के लिए तंवर-हुड्डा की सक्रियता के बीच मेवात की अनदेखी पर उठे सवाल। क्या कांग्रेस मेवात को सिर्फ वोट बैंक मानती है? जानें मेव नेतृत्व के हाशिए पर होने का पूरा सच।

नई दिल्ली/मेवात/चंडीगढ़ (The Asia Prime): दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ अशोक तंवर और दीपेंद्र सिंह हुड्डा की हालिया मुलाकात ने हरियाणा की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस मुलाकात को भले ही औपचारिक बताया जा रहा हो, लेकिन सियासी गलियारों में इसे राज्यसभा की संभावित सीट और हरियाणा कांग्रेस के भीतर बदलते ‘शक्ति-संतुलन’ से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, इन हाई-प्रोफाइल मुलाकातों के बीच एक बड़ा और बुनियादी सवाल फिर दब गया है— मेवात का राजनीतिक हक और उसकी हिस्सेदारी।

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तंवर-हुड्डा का मिलन: मजबूरी या रणनीतिक समीकरण?

​कल तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे हुड्डा गुट और अशोक तंवर का एक साथ खड़गे से मिलना कई संभावनाओं को जन्म देता है:

  • राज्यसभा की जंग: क्या अशोक तंवर को राज्यसभा भेजने के लिए हुड्डा गुट ने अपनी सहमति दे दी है?
  • साझा समझ: क्या हरियाणा कांग्रेस के पुराने समीकरण अब एक नई ‘साझा समझ’ की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ पुराने मतभेदों को किनारे कर सीटों का बंटवारा किया जा रहा है?

मेवात: जहाँ वोट की फसल भरपूर, पर नेतृत्व का सूखा

​हरियाणा में मेवात (नूंह) वह क्षेत्र है जिसने कांग्रेस को सबसे कठिन समय में भी ‘संजीवनी’ दी है। हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो:

  1. ऐतिहासिक जीत: फिरोजपुर झिरका जैसी सीट पर कांग्रेस को 72% वोट शेयर और करीब 1 लाख वोटों का ऐतिहासिक अंतर मिला।
  2. स्थिर समर्थन: राजस्थान से लेकर हरियाणा तक मेव समाज कांग्रेस का सबसे वफादार आधार रहा है।
  3. अल्पसंख्यक नेतृत्व की अनदेखी: इसके बावजूद, जब राज्यसभा भेजने या संगठन के निर्णायक पदों (CWC या मुख्य बॉडी) की बात आती है, तो मेवात का नाम गायब हो जाता है।

संगठन में हिस्सेदारी: सिर्फ ‘अपवाद’ तक सीमित?

​हाल ही में कांग्रेस की मुख्य संगठनात्मक बॉडी का गठन हुआ, लेकिन उसमें मेवात के किसी कद्दावर मेव नेता को जगह नहीं मिली। अपवाद स्वरूप राजस्थान के रामगढ़ से पूर्व विधायक साफ़िया ज़ुबैर को महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया, लेकिन यह उस मेव समाज के योगदान के मुकाबले ऊँट के मुँह में जीरे के समान है जो राजीव गांधी के दौर से पार्टी का झंडा उठाए खड़ा है।

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सवाल कांग्रेस की नीयत पर: मतदाता या भागीदार?

​मेवात के जागरूक युवाओं और राजनैतिक विश्लेषकों का पूछना है कि:

  • ​क्या कांग्रेस को मेवात से सिर्फ ‘वोट’ चाहिए, लेकिन वहां के नेताओं की ‘आवाज़’ नहीं?
  • ​राज्यसभा जैसे मंचों पर मेवात के किसी चेहरे को मौका क्यों नहीं दिया जाता?
  • ​क्या यह मेवात के नेतृत्व की विफलता है या कांग्रेस की वह ‘संरचनात्मक अनदेखी’, जहाँ अल्पसंख्यक समाज की उदारता को उसकी कमजोरी समझ लिया गया है?

​लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि सम्मान और साझेदारी का प्रतीक है। फिरोजपुर झिरका, पुनहाना और नूंह में कांग्रेस के सभी प्रत्याशियों की जीत यह साबित करती है कि मेवात कांग्रेस का मजबूत किला है। यदि राहुल गांधी और खड़गे इस किले की बुर्जियों (नेताओं) को दिल्ली के निर्णायक मंचों पर जगह नहीं देते, तो यह केवल एक ‘रणनीतिक भूल’ नहीं, बल्कि उस वफादार समाज के साथ राजनीतिक विश्वासघात कहलाएगा।

​राज्यसभा की सीट पर किसी ‘बाहरी’ या ‘गठजोड़’ के नेता को बैठाने से पहले कांग्रेस को मेवात के उस ऐतिहासिक 72% वोट शेयर को याद करना चाहिए।

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