
राष्ट्रपति के बंगाल और बिहार दौरों में अगवानी को लेकर उठे सवाल। नालंदा में हुए अपराध पर सर्वोच्च पदों की चुप्पी ने खड़ा किया विवाद।
नई दिल्ली/पटना ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News): देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति के दौरों को लेकर हाल ही में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद प्रोटोकॉल, राजनीतिक अगवानी और चुनिंदा संवेदनशीलताओं को लेकर है। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आखिर राष्ट्रपति के सम्मान और संवेदना के पैमाने अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्यों नजर आ रहे हैं?
बंगाल बनाम बिहार: अगवानी का दोहरा मापदंड?
पिछले दिनों जब राष्ट्रपति पश्चिम बंगाल के दौरे पर गई थीं, तो वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनकी अगवानी (Protocol) के लिए नहीं पहुंची थीं। खबर है कि इस पर राष्ट्रपति ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी और एक संक्षिप्त संबोधन में इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया था। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना को ‘अपमानजनक और शर्मनाक’ करार दिया था।
लेकिन, इसके विपरीत हालिया बिहार दौरे की तस्वीर बिल्कुल अलग रही। नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शिरकत करने पहुंचीं राष्ट्रपति की अगवानी के लिए न तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे और न ही कोई उपमुख्यमंत्री या वरिष्ठ मंत्री। बावजूद इसके, वहां राष्ट्रपति की ओर से किसी भी तरह की नाराजगी या क्षोभ व्यक्त नहीं किया गया। इस विरोधाभास ने अब सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या अगवानी का प्रोटोकॉल केवल विपक्षी शासित राज्यों के लिए ही अनिवार्य है?
नालंदा: दीक्षांत की चमक और अपराध का अंधेरा
राष्ट्रपति जिस समय नालंदा में ज्ञान और शिक्षा की बात कर रही थीं, उसी जिले में तीन दिन पहले मानवता को शर्मसार करने वाली घटना घटी थी। सड़क पर एक युवती के साथ दिनदहाड़े गैंगरेप की कोशिश का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
- चुप्पी पर सवाल: स्थानीय जनता और विपक्ष का पूछना है कि क्या राष्ट्रपति की संवेदनाएं इस घटना पर नहीं जागीं?
- पीएम की खामोशी: आलोचकों का कहना है कि प्रधानमंत्री अक्सर भाजपा शासित या सहयोगी दलों वाले राज्यों में होने वाली ऐसी गंभीर वारदातों पर मौन रहते हैं, जबकि अन्य राज्यों में ऐसी घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया आती है।
मुख्यमंत्री कब-कब नहीं पहुंचे अगवानी में? (फ्लैशबैक)
इतिहास और हालिया रिकॉर्ड्स बताते हैं कि कई बार मुख्यमंत्री अपनी व्यस्तताओं या राजनीतिक मतभेदों के कारण राष्ट्रपति की अगवानी में शामिल नहीं हुए:
- तेलंगाना: पूर्व मुख्यमंत्री केसीआर (KCR) ने कई बार प्रोटोकॉल तोड़ते हुए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की अगवानी नहीं की थी।
- कर्नाटक: सिद्धारमैया सरकार के दौरान भी ऐसे मामले सामने आए।
- केरल: पिनाराई विजयन भी कई मौकों पर आधिकारिक अगवानी से दूर रहे हैं।
राष्ट्रपति का पद किसी दल का नहीं, बल्कि पूरे देश का होता है। यदि बंगाल में मुख्यमंत्री का न आना अपमान है, तो बिहार में भी इसे उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। साथ ही, नालंदा जैसी हृदयविदारक घटना पर देश के सर्वोच्च पदों से संवेदना के दो शब्द न आना जनता के बीच एक नकारात्मक संदेश भेजता है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन पद की गरिमा और मानवीय संवेदनाएं राजनीति से ऊपर होनी चाहिए।
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