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दिल्ली:इच्छामृत्यु’ की दहलीज पर खड़ा हरीश: पिता की मौत के बाद बेबस मां की आंखों में आखिरी उम्मीद; कोर्ट के आदेश पर AIIMS की टीम करेगी फैसला

11 साल से कोमा में है बेटा, मां ने मांगी मौत की इजाजत; दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश के बाद मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट तय करेगी हरीश राणा का भविष्य। एक भावुक कर देने वाली कानूनी और मानवीय दास्तान।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 11 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा की इच्छामृत्यु याचिका पर AIIMS को मेडिकल बोर्ड बनाने का आदेश दिया। बेबस मां ने बेटे के लिए मांगी मौत की अनुमति।

नई दिल्ली/ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News) : राजधानी दिल्ली से एक ऐसी हृदयविदारक खबर सामने आई है जिसने कानून, नैतिकता और ममता के त्रिकोण पर नई बहस छेड़ दी है। पिछले 11 वर्षों से बिस्तर पर ‘जिंदा लाश’ बनकर पड़े हरीश राणा की मां ने अपने बेटे के लिए ‘इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) की गुहार लगाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों को मेडिकल जांच के बाद फैसला लेने का आदेश दिया है।

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क्या है हरीश राणा की कहानी?

​30 वर्षीय हरीश राणा साल 2013 में एक दुर्घटना का शिकार हुए थे। सिर में गंभीर चोट लगने के कारण वे ‘परमानेंट वेजीटेव स्टेट’ (कोमा) में चले गए। तब से लेकर आज तक हरीश न तो बोल सकते हैं, न चल सकते हैं और न ही अपनी कोई जरूरत बता सकते हैं।

कोर्ट का आदेश और मेडिकल बोर्ड की भूमिका

​दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी को भी मरने का अधिकार देना एक जटिल कानूनी प्रक्रिया है। कोर्ट ने AIIMS के विशेषज्ञों का एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया है।

  1. मेडिकल जांच: टीम यह देखेगी कि क्या हरीश के ठीक होने की कोई भी गुंजाइश बाकी है?
  2. रिपोर्ट का इंतजार: यदि बोर्ड यह प्रमाणित करता है कि हरीश का शरीर केवल मशीनों या नली के सहारे जीवित है और सुधार की कोई संभावना नहीं है, तो कोर्ट ‘पैसिव इच्छामृत्यु’ की अनुमति दे सकता है।
  3. अगली प्रक्रिया: कोर्ट ने साफ किया है कि विशेषज्ञों की राय के बिना कोई भी अंतिम फैसला नहीं लिया जाएगा।

एक मां की आखिरी निहार

​अस्पताल के कमरे में जब एम्स की टीम जांच के लिए पहुंचती है, तो हरीश की मां की नजरें अपने बेटे के चेहरे से नहीं हटतीं। वह बार-बार उसे निहारती हैं—शायद इसलिए कि यह आखिरी बार हो सकता है, या शायद इस उम्मीद में कि वह एक बार अपनी आंखें खोल दे। यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखों में आंसू ला देता है। मां का कहना है, “मेरा कलेजा फटता है जब उसे इस हाल में देखती हूं। मैं उसे मारना नहीं चाहती, लेकिन उसे इस नर्क से आजाद करना चाहती हूं।”

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भारत में क्या है ‘इच्छामृत्यु’ का कानून?

​सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के एक ऐतिहासिक फैसले में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) को वैध माना था। इसके तहत अगर कोई मरीज लाइलाज स्थिति में है और होश में नहीं है, तो मेडिकल बोर्ड की सलाह पर उसका ‘लाइफ सपोर्ट’ (जीवन रक्षक प्रणाली) हटाया जा सकता है। हरीश राणा का केस इसी कानून के तहत एक बड़ी परीक्षा है।

​हरीश राणा का मामला समाज के सामने कई सवाल खड़ा करता है। क्या गरिमा के साथ जीने के अधिकार में ‘गरिमा के साथ मरने’ का अधिकार भी शामिल है? एक मां जो अपने बच्चे को पालती है, उसका मौत मांगना कितना पीड़ादायक होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। कानून अपनी जगह है, लेकिन मानवीय संवेदनाएं आज इस मामले में एक अलग ही जंग लड़ रही हैं।

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