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भारतीय कुश्ती के ‘भीष्म पितामह’ उदय चंद: हिसार फतेहाबाद के जांडली गाँव से निकलकर विश्व पटल पर छाने वाले पहले ‘अर्जुन अवॉर्डी’ की गाथा पर सरकारें भूल गईं ‘पद्म’ सम्मान देना?

62 किलो के शरीर में 100 किलो वाले पहलवानों को धूल चटाने का दमखम; लगातार 13 साल नेशनल चैंपियन रहने का अटूट रिकॉर्ड और आज़ाद भारत को कुश्ती में पहला वर्ल्ड मेडल दिलाने वाले महानायक।'The Asia Prime' की भारत सरकार से पुरजोर अपील— इस खेल रत्न को मिले पद्म पुरस्कार दे।

हिसार के जांडली गाँव के लाल उदय चंद पहलवान की अनकही दास्तान। स्वतंत्र भारत के पहले विश्व पदक विजेता और कुश्ती के पहले अर्जुन अवॉर्डी। जानें उनकी 13 साल की बादशाहत का राज। अजेय रहने वाले नेशनल चैंपियन। क्या सरकार उन्हें पद्म सम्मान देगी?

हिसार ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News) भारतीय कुश्ती के इतिहास में जब भी शौर्य और तकनीक की बात होगी, मास्टर उदय चंद का नाम सुनहरे अक्षरों में लिया जाएगा। 25 जून 1935 को जो पहले हिसार जिले के जांडली गाँव में जन्मे उदय चंद ने उस दौर में कुश्ती के क्षेत्र में तिरंगा फहराया, जब सुविधाएं न के बराबर थीं। वे केवल एक पहलवान नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्था थे जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए सफलता का रास्ता बनाया।

सरकार की अनदेखी: क्या पद्म सम्मान के हकदार नहीं उदय चंद?

​इतनी विराट उपलब्धियों के बावजूद, आज खेल प्रेमियों और जांडली गांव के लोगों के मन में एक टीस है। जिस खिलाड़ी ने आजाद भारत को कुश्ती का पहला विश्व पदक दिलाया, उसे अभी तक पद्म पुरस्कारों (पद्म श्री या पद्म भूषण) के योग्य क्यों नहीं समझा गया? हरियाणा सरकार और भारत सरकार द्वारा खेल जगत के बड़े सम्मानों की फेहरिस्त में उदय चंद का नाम न होना भारतीय खेल जगत की एक बड़ी विसंगति मानी जाती है।

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स्वतंत्र भारत के पहले विश्व पदक विजेता

​उदय चंद के नाम एक ऐसा गौरवशाली रिकॉर्ड है जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। 1961 में जापान के योकोहामा में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में उन्होंने 67 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में कांस्य पदक जीता। इसके साथ ही वे स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत विश्व चैंपियनशिप पदक विजेता बने। उनकी इस उपलब्धि ने दुनिया को भारतीय कुश्ती की ताकत का अहसास कराया।

उपलब्धियां जो आज भी एक मिसाल हैं:

  1. पहला अर्जुन पुरस्कार: खेल के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए सरकार ने 1961 में उन्हें कुश्ती के लिए पहला अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया। खास बात यह है कि यह पुरस्कार उसी वर्ष स्थापित किया गया था।
  2. लगातार 13 वर्ष नेशनल चैंपियन: 1958 से 1970 तक उदय चंद को कोई हरा नहीं सका। वे लगातार 13 वर्षों तक राष्ट्रीय चैंपियन रहे, जो आज भी एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड है।
  3. एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों का सफर: * 1962 जकार्ता एशियाई खेल: फ्रीस्टाइल और ग्रीको-रोमन दोनों में रजत पदक।

62 किलो के ‘जादुई’ पहलवान: तकनीक ऐसी कि दिग्गज भी खा जाते थे मात

उदय चंद के बारे में सबसे चर्चित बात उनकी तकनीक और अदम्य साहस था। वे खुद 62-67 किलोग्राम वजन वर्ग में लड़ते थे, लेकिन अखाड़े में वे 100 किलो तक के भारी-भरकम पहलवानों को अपनी फुर्ती और दांव-पेंच से चित कर देते थे। उनकी रणनीति और दमखम के आगे बड़े-बड़े दिग्गज पानी मांगते थे।

कोचिंग के जरिए तैयार की नई पौध

​भारतीय सेना से सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने अपनी मिट्टी की सेवा करने का फैसला किया। 1970 से 1996 तक उन्होंने चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU), हिसार में कुश्ती कोच के रूप में सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने दर्जनों अंतरराष्ट्रीय पहलवान तैयार किए और विश्वविद्यालय की टीम को राष्ट्रीय फलक पर पहचान दिलाई।

 (The Asia Prime Editorial)

​उदय चंद भारतीय कुश्ती के वो हस्ताक्षर हैं जिन्होंने मिट्टी की कुश्ती को मैट पर चमकना सिखाया। उनकी उपलब्धियाँ केवल पदक तक सीमित नहीं हैं, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणापुंज हैं। यह समय की मांग है कि सरकार उनके योगदान को वह सम्मान दे, जिसके वे वास्तव में हकदार हैं।

THE ASIA PRIME की अपील: अब और देरी क्यों?

​विडंबना देखिए, जिस खिलाड़ी ने भारत को कुश्ती का पहला विश्व पदक दिलाया, जिसने लगातार 13 साल तक देश में अपनी बादशाहत कायम रखी, वह आज भी पद्म पुरस्कारों (पद्म श्री, पद्म भूषण) की सूची से बाहर है।

THE ASIA PRIME  की मांग:

  • भारत सरकार से अपील है कि खेल के इस महानायक के योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें उनके जीवनकाल में ही (जैसा भी उचित हो) पद्म सम्मान से नवाजा जाए।
  • हरियाणा सरकार और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इस मामले की केंद्र में मजबूती से पैरवी करें।

जांडली की मिट्टी का यह लाल आज भी सम्मान की प्रतीक्षा में है। यह केवल उदय चंद का सम्मान नहीं, बल्कि उस कुश्ती परंपरा का सम्मान होगा जिसने भारत को ओलंपिक में सबसे ज्यादा पदक दिए हैं।

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