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बिल्ली को दूध की रखवाली! ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए डेनमार्क ने अमेरिका से मांगे हथियार; क्या ‘संरक्षक’ ही बन जाएगा ‘भक्षक’?

सुरक्षा के नाम पर सौदेबाजी: ग्रीनलैंड को बचाने के लिए डेनमार्क ने थामी अमेरिका की उंगली; विशेषज्ञों ने पूछा—अपने ही शिकारी से हथियार लेना कितनी बड़ी बुद्धिमानी?"

डेनमार्क द्वारा ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए अमेरिकी हथियार खरीदने के फैसले पर उठे सवाल। विशेषज्ञों ने ब्रह्मोस मिसाइल को बताया बेहतर विकल्प। क्या अमेरिका का बढ़ेगा दबदबा?

कोपेनहेगन/वाशिंगटन (The Asia Prime): अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक पुरानी कहावत है—”मुफ्त की सुरक्षा सबसे महंगी पड़ती है।” डेनमार्क और ग्रीनलैंड के मामले में यह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। डेनमार्क ने घोषणा की है कि वह ग्रीनलैंड की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अमेरिका से अत्याधुनिक हथियार और मिसाइल सिस्टम खरीदेगा। लेकिन जानकारों का मानना है कि यह कदम वैसा ही है जैसे “बिल्ली को दूध की रखवाली सौंपना।”

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ग्रीनलैंड पर अमेरिका की ‘पुरानी नजर’

​यह कोई रहस्य नहीं है कि अमेरिका लंबे समय से ग्रीनलैंड पर अपना नियंत्रण चाहता है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो सार्वजनिक रूप से ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा तक जताई थी। रणनीतिक रूप से ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र का प्रवेश द्वार है और यहाँ प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन छिपे हैं। ऐसे में डेनमार्क का अपनी रक्षा के लिए उसी शक्ति पर निर्भर होना, जो उस जमीन पर नजरें गड़ाए बैठी है, कई सवाल खड़े करता है।

ब्रह्मोस क्यों हो सकता था बेहतर विकल्प?

​रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि डेनमार्क के लिए भारत की ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल एक ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकती थी। इसके पीछे ठोस कूटनीतिक कारण हैं:

  • तकनीकी संप्रभुता: यदि आप अमेरिका से मिसाइल खरीदते हैं, तो उसका ‘किल स्विच’ और उसका ‘तोड़’ हमेशा अमेरिका के पास रहेगा। युद्ध की स्थिति में अमेरिका उन हथियारों को सॉफ्टवेयर के जरिए निष्क्रिय भी कर सकता है।
  • निष्पक्ष रक्षा: ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। भारत से हथियार खरीदने का मतलब होता—एक ऐसी शक्ति से सौदा करना जिसकी ग्रीनलैंड की जमीन में कोई राजनीतिक दिलचस्पी नहीं है। यह शुद्ध रूप से एक रक्षा सौदा होता, न कि राजनीतिक गुलामी।
  • अजेय मारक क्षमता: ब्रह्मोस की गति और अचूक मारक क्षमता का तोड़ फिलहाल पश्चिम के कई रक्षा तंत्रों के पास भी नहीं है।

हथियारों की खरीद या रणनीतिक जाल?

​डेनमार्क का यह फैसला उसकी नाटो (NATO) के प्रति प्रतिबद्धता को तो दर्शाता है, लेकिन ग्रीनलैंड की सुरक्षा के नाम पर वह अमेरिका को वहां और अधिक पैर पसारने का न्यौता दे रहा है। जब आपके हथियार और उनकी तकनीक आपके ‘संभावित कब्जाधारी’ के नियंत्रण में हो, तो आप सुरक्षित नहीं, बल्कि ‘निर्भर’ होते हैं।

​रक्षा सौदों में केवल ‘ब्रांड’ नहीं, बल्कि ‘भरोसा’ देखा जाता है। डेनमार्क ने अमेरिकी हथियारों को चुनकर शायद अपनी सैन्य शक्ति तो बढ़ा ली हो, लेकिन कूटनीतिक रूप से उसने ग्रीनलैंड की चाबी वाशिंगटन के हाथों में सौंप दी है। भारत की ब्रह्मोस जैसी स्वतंत्र तकनीकें आज उन देशों के लिए उम्मीद हैं जो अपनी सुरक्षा तो चाहते हैं, लेकिन अपनी आजादी की कीमत पर नहीं।

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