
राहुल गांधी ने संसद में कृषि मंत्रालय को घेरा। कपास उत्पादन में गिरावट और मखाना बोर्ड की विफलता पर उठाए सवाल। मोदी सरकार की योजनाओं को बताया ‘दिखावा’।
नई दिल्ली/ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News) : संसद के बजट सत्र के दौरान आज कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कृषि क्षेत्र की बदहाली और किसानों की उपेक्षा का मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। राहुल गांधी ने कृषि मंत्रालय से सीधे सवाल पूछते हुए कहा कि पिछले साल खेती-बाड़ी को लेकर जो बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं, वे जमीन पर कहीं नजर नहीं आ रही हैं। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश का कृषि उत्पादन बढ़ने के बजाय घट रहा है, जिससे किसान और आम जनता दोनों संकट में हैं।
कपास और दलहन: आंकड़ों की जुबानी बदहाली की कहानी
राहुल गांधी ने सदन में कृषि उत्पादन के चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए:
- कपास का गिरता ग्राफ: 2020-21 में कपास का उत्पादन 35.2 MMT था, जो 2024-25 में घटकर मात्र 29.7 MMT रह गया है।
- दालों की स्थिति जस की तस: दलहन के उत्पादन में कोई खास बढ़त नहीं हुई है। 2020-21 में यह 25.5 MMT था, जो चार साल बाद 2024-25 में मामूली बढ़कर 25.7 MMT पर ही अटका हुआ है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उत्पादन न बढ़ने के कारण भारत को विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका सीधा नुकसान भारतीय किसान को होता है क्योंकि उसे विदेशी उत्पादों से मुकाबला करना पड़ता है और आम परिवार बढ़ती कीमतों के बोझ तले दब जाते हैं।
मखाना बोर्ड: “शोर ज्यादा, काम आधा”
राहुल गांधी ने बिहार और अन्य राज्यों के किसानों के लिए घोषित मखाना बोर्ड की स्थिति पर भी सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा:
- बजट का मजाक: बोर्ड के लिए वादे की रकम का मात्र 5% (करीब ₹27 करोड़) ही जारी किया गया है।
- लापता बोर्ड: घोषणा के महीनों बाद भी सरकार यह तय नहीं कर पाई है कि मखाना बोर्ड का मुख्यालय कहां होगा।
“दिखावे की योजनाएं”
कांग्रेस नेता ने तंज कसते हुए कहा कि मोदी सरकार की योजनाएं और बजट जनता के फायदे के लिए नहीं, बल्कि केवल विज्ञापन और दिखावे के लिए बनाए जाते हैं। उन्होंने मांग की कि सरकार केवल कागजी घोषणाएं करने के बजाय किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और निवेश की ठोस गारंटी दे।
राहुल गांधी द्वारा उठाए गए ये आंकड़े गंभीर चिंता का विषय हैं। कपास जैसे नकदी फसलों का उत्पादन गिरना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। सरकार को यह जवाब देना चाहिए कि यदि बजट आवंटित हो रहा है, तो वह जमीन तक क्यों नहीं पहुंच रहा? ‘दिखावे की राजनीति’ से हटकर अब कृषि क्षेत्र में वास्तविक सुधारों और विजन की जरूरत है।