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वृद्ध माता-पिता की अनदेखी पर छिड़ी जंग: क्या विदेश में बसे बच्चों का रद्द होगा पासपोर्ट? बीजेपी सांसद की संसद में बड़ी मांग

"विदेश में ऐश, घर में मां-बाप बेसहारा? बीजेपी सांसद ने मांगा कड़ा कानून; क्या पासपोर्ट रद्द करना होगा 'कलियुगी' बच्चों का इलाज?"

बीजेपी सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने राज्यसभा में विदेश में रह रहे भारतीयों के पासपोर्ट रद्द करने की मांग की, जो अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते। जानें क्या है पूरा मामला।

नई दिल्ली/ ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News)  भारत की जड़ें हमेशा से पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों में रही हैं, लेकिन आधुनिकता और विदेश जाने की होड़ ने इस नींव को हिलाकर रख दिया है। राज्यसभा में बीजेपी सांसद डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने एक ऐसा मुद्दा उठाया है जिसने देश के करीब 3.5 करोड़ एनआरआई (NRI) परिवारों के बीच खलबली मचा दी है। सांसद ने मांग की है कि जो बच्चे विदेश जाकर अपने बूढ़े माता-पिता को बेसहारा छोड़ देते हैं, सरकार को उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए उनके पासपोर्ट रद्द कर देने चाहिए।

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“माता-पिता के त्याग की कीमत चुकाएं बच्चे”

​डॉ. अग्रवाल ने सदन में तर्क दिया कि कोई भी व्यक्ति केवल अपनी योग्यता से विदेश नहीं पहुंचता। इसके पीछे उनके माता-पिता का ‘पेट काटकर’ किया गया त्याग, तपस्या और कभी-कभी बेची गई जमीन-जायदाद होती है। साथ ही, उन्होंने भारत सरकार की सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं के योगदान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सफल होने के बाद अपने माता-पिता को अकेला छोड़ देना न केवल अनैतिक है बल्कि एक सामाजिक अपराध है।

सांसद द्वारा प्रस्तावित 3 प्रमुख शर्तें:

​सांसद अग्रवाल ने सरकार के सामने एक विशेष व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा है:

  1. आय का हिस्सा: विदेश में रह रहे भारतीय अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से अपने माता-पिता की देखभाल के लिए भारत भेजें।
  2. नियमित संपर्क: सप्ताह में कम से कम एक बार टेलीफोन या वीडियो कॉल के जरिए अपने माता-पिता का हालचाल लें।
  3. कड़ी सजा: जो बच्चे इन नियमों का पालन न करें और माता-पिता की शिकायत सही पाई जाए, उनका पासपोर्ट रद्द कर उन्हें वापस भारत लाया जाए।

अकेलेपन में मौत: 500 से अधिक दर्दनाक मामले

​सांसद ने दिल्ली और इंदौर की हालिया घटनाओं का हवाला देते हुए बताया कि देश में हर साल करीब 500 ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां अकेले रह रहे बुजुर्गों की मौत हो गई और हफ्तों तक उनके शव घर में ही सड़ते रहे, क्योंकि उनकी संतान विदेश में थी और उन्होंने सुध तक नहीं ली। उन्होंने आरोप लगाया कि कई लोग अपने माता-पिता को केवल तब विदेश बुलाते हैं जब उन्हें वहां अपने बच्चों (पोते-पोतियों) की देखभाल के लिए ‘फ्री’ के आया (Nanny) की जरूरत होती है।

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क्या मांग वाजिब है? एक कानूनी नजरिया

​भारत में पहले से ही ‘माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ लागू है। इसके तहत माता-पिता को छोड़ना दंडनीय है। लेकिन पासपोर्ट रद्द करने जैसी मांग पर कानूनी जानकारों की मिली-जुली राय है:

  • चुनौती: पासपोर्ट रद्द करना किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों (यात्रा का अधिकार) का उल्लंघन माना जा सकता है।
  • जरूरत: सामाजिक दबाव और सख्त कानून ही इस बढ़ते ‘ओल्ड एज होम’ कल्चर को रोक सकते हैं।

 (The Asia Prime Editorial)

डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल की यह मांग उन लाखों बुजुर्गों की ‘मूक पुकार’ है जो आलीशान घरों में अकेलेपन का जहर पीने को मजबूर हैं। भले ही पासपोर्ट रद्द करना तकनीकी रूप से जटिल हो, लेकिन यह बहस विदेशों में बसे भारतीयों को अपनी नैतिक जिम्मेदारी याद दिलाने के लिए एक जरूरी चेतावनी है।

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