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रोहतक: मेडिकल शिक्षा पर सवाल! रोहतक पीजीआई में 800 में से ‘4 नंबर’ वाले का दाखिला; मेरिट बनाम आरक्षण की बहस ने पकड़ा तूल क्या ये सही है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुई मार्कशीट: क्या 800 में से मात्र 4 अंक पाने वाला बनेगा डॉक्टर? जानें इस पूरे विवाद और संवैधानिक व्यवस्था का सच।

रोहतक मेडिकल कॉलेज में मात्र 4 अंक पाने वाले छात्र के सिलेक्शन ने मचाया हड़कंप। सोशल मीडिया पर मेरिट और आरक्षण को लेकर छिड़ी बड़ी जंग। जानें क्या कहता है संविधान और क्या है इस वायरल खबर की सच्चाई।

रोहतक/हरियाणा। ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News) : शिक्षा और योग्यता के मंदिर कहे जाने वाले मेडिकल कॉलेजों से एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे देश के बुद्धिजीवियों, छात्रों और सोशल मीडिया यूजर्स को हैरान कर दिया है। हरियाणा के रोहतक स्थित पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (PGIMS) में एक उम्मीदवार के दाखिले को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दावा किया जा रहा है कि एक छात्र ने 800 में से मात्र 4 अंक प्राप्त किए और उसे देश के प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में से एक में प्रवेश मिल गया।

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क्या है पूरा मामला?

​पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक मार्कशीट और अलॉटमेंट लेटर तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें दिखाया गया है कि एक विशेष श्रेणी (संभवतः आरक्षित वर्ग) के उम्मीदवार ने प्रवेश परीक्षा में बेहद कम अंक हासिल किए, लेकिन आरक्षण और श्रेणी-वार कट-ऑफ (Cut-off) के चलते उसे रोहतक के सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट आवंटित कर दी गई। वायरल पोस्ट में  लिखा गया है— “धन्य है भारत का संविधान, जहाँ 4 नंबर लाने वाला भी डॉक्टर बनेगा ओर 544 नम्बर वाला घर बैठेगा।”

मेरिट बनाम सामाजिक न्याय: एक पुरानी बहस

​यह खबर सामने आते ही इंटरनेट पर दो पक्ष की प्रतिक्रिया आई । एक पक्ष का कहना है कि मेडिकल जैसे पेशे में, जहाँ लोगों की जान दांव पर होती है, वहां योग्यता (Merit) से किसी भी तरह का समझौता करना आत्मघाती हो सकता है। छात्रों का तर्क है कि यदि प्रवेश का आधार केवल आरक्षण होगा और न्यूनतम योग्यता के मानकों को इतना गिरा दिया जाएगा, तो भविष्य के स्वास्थ्य ढांचे पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

​वहीं, दूसरा पक्ष इसे संविधान द्वारा दिए गए ‘समान अवसर’ और ‘सामाजिक न्याय’ के रूप में देख रहा है। समर्थकों का तर्क है कि आरक्षण का उद्देश्य उन वर्गों को मुख्यधारा में लाना है जो सदियों से पीछे रहे हैं। वे इसे ‘योग्यता की हत्या’ नहीं बल्कि ‘पिछड़ों को सहारा’ देने की प्रक्रिया मानते हैं।

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क्या कहती है संवैधानिक व्यवस्था?

​भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत पिछड़े वर्गों और विशेष श्रेणियों को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। मेडिकल परीक्षाओं (जैसे NEET) में भी प्रत्येक श्रेणी के लिए अलग-अलग कट-ऑफ निर्धारित होती है।

  • न्यूनतम क्वालीफाइंग अंक: हालांकि नियम के अनुसार, एक न्यूनतम पर्सेंटाइल अनिवार्य होता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में (जैसे दिव्यांग कोटा या आरक्षित वर्ग में सीटों का खाली रहना) कई बार कट-ऑफ उम्मीद से काफी नीचे चली जाती है।
  • सीटों का गणित: यदि किसी आरक्षित श्रेणी में योग्य उम्मीदवार कम हों और सीटें अधिक, तो प्रक्रिया के तहत सबसे निचले अंक वाले उम्मीदवार को भी मौका मिल सकता है।

​मेडिकल साइंस के विशेषज्ञों की चिंता

​शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह के ‘अति-न्यूनतम’ अंकों पर दाखिला देना भविष्य में चिंता का विषय हो सकता है। रोहतक पीजीआई के कुछ वरिष्ठ डॉक्टरों (गोपनीयता की शर्त पर) ने कहा कि दाखिला मिल जाना एक बात है, लेकिन साढ़े पांच साल की कठिन मेडिकल पढ़ाई और एमबीबीएस की परीक्षा पास करना बिना मेहनत के संभव नहीं है। यदि छात्र वहां सफल नहीं होता, तो वह डिग्री प्राप्त नहीं कर पाएगा।

​यह घटना केवल एक छात्र के दाखिले की नहीं है, बल्कि देश की पूरी प्रवेश प्रणाली और संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन की चुनौती है। क्या हमें स्वास्थ्य सेवाओं में ‘न्यूनतम योग्यता’ का एक ऐसा बैरियर लगाना चाहिए जिससे नीचे किसी को प्रवेश न मिले? या फिर सामाजिक प्रतिनिधित्व को ही सर्वोपरि रखना चाहिए? रोहतक की यह ‘4 नंबर’ वाली कहानी आज हर उस युवा के मन में चुभ रही है जो 600 नंबर लाकर भी सरकारी सीट के लिए संघर्ष कर रहा है।

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