मुआवजे की ‘चमक’ और बर्बादी की ‘कथा’: ग्रेटर नोएडा के किसानों की सिसकती दास्तान; करोड़पति बने और अब गार्ड की नौकरी को मजबूर
जमीन गई, करोड़ों आए, पर भविष्य 'शून्य'! रामेश्वर सिंह की कहानी है 95% उन किसानों की व्यथा, जिन्होंने सवा 5 करोड़ का मुआवजा शादियों और गाड़ियों में उड़ाया; आज अपनी ही जमीन पर पराये हुए किसान।

ग्रेटर नोएडा के किसानों की बर्बादी की रिपोर्ट। कैसे मुआवजे के करोड़ों रुपए फिजूलखर्ची में खत्म हुए और अब किसान मजदूरी को मजबूर हैं। रामेश्वर सिंह की आपबीती।
ग्रेटर नोएडा/ब्यूरो चीफ: सतबीर जांडली (The Asia Prime / TAP News): यह कहानी केवल 90 साल के रामेश्वर सिंह की नहीं है, बल्कि यह ग्रेटर नोएडा के उन 39 से ज्यादा गांवों की कड़वी सच्चाई है, जिनकी किस्मत एक झटके में ‘जमीन’ से ‘आसमान’ पर पहुंची और फिर धड़ाम से नीचे गिर गई। 1991 से लेकर 2012 के बीच जमीन अधिग्रहण के दौर में जो किसान रातों-रात करोड़पति बने थे, आज उनमें से 95 फीसदी के हाथ खाली हैं।
केस स्टडी: रामेश्वर सिंह की 12 एकड़ और सवा 5 करोड़ का ‘भ्रम’
रामेश्वर सिंह बताते हैं कि जब उनकी 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली, तो उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए मिले। उस वक्त यह रकम पहाड़ जैसी लगती थी। पैसा हाथ में आते ही जीवनशैली बदल गई:
- दिखावे का दौर: 1 करोड़ से ज्यादा के आलीशान मकान, महंगी गाड़ियाँ और शादियों में पानी की तरह पैसा बहाया गया।
- दहेज का बोझ: तीन बेटियों और दो पोतियों की शादियों में 20-20 तोला सोना और 20-20 लाख की गाड़ियाँ दी गईं। एक-एक शादी में 80-80 लाख रुपए खर्च हुए।
- जमीन का अफसोस: रामेश्वर कहते हैं, “आज उस जमीन की कीमत 80 करोड़ है, लेकिन हमारे पास अब न जमीन बची है, न पैसा।”
जमीन का पैसा जमीन में ही टिकता है, पर कहाँ गई चूक?
ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी ने जब जमीनें लीं, तो कुछ किसानों ने बागपत और हापुड़ में जमीनें खरीदीं, लेकिन अधिकांश परिवारों ने मुआवजे की रकम को अनुत्पादक खर्चों (Consumption) में उड़ा दिया।
- मैनेजमेंट की कमी: किसानों ने माना कि उन्हें ‘पैसा संभालना’ नहीं आया। अचानक आई लक्ष्मी ने दिमाग को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया।
- नौकरी का संकट: आज वे किसान, जिनके पास कभी सैकड़ों बीघा जमीन थी, अपनी ही जमीन पर बनी फैक्ट्रियों में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहे हैं या इमारतों में दूध बेच रहे हैं।
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“जमीन हमारी गई और हम ही पराए हो गए”
चौपाल पर बैठे रामेश्वर सिंह का दर्द छलकता है जब वे कहते हैं कि फैक्ट्रियां तो हमारी जमीन पर लगीं, लेकिन हमारे बच्चों को नौकरी नहीं मिली। फैक्ट्री मालिकों का तर्क है कि ‘लोकल’ लड़के बदमाश होते हैं।
- नई पीढ़ी का भविष्य: अगली पीढ़ी के पास अब न जमीन है, न पैसा और न ही उच्च शिक्षा के सहारे पक्की नौकरी। बड़ी नौकरी की योग्यता नहीं और छोटी नौकरी करने में किसानों के बच्चों को शर्म आती है।
ग्रेटर नोएडा की यह ‘स्याह कहानी’ विकास के उस मॉडल पर सवाल उठाती है, जहाँ किसान को पैसा तो मिला, लेकिन उसे निवेश करने का ज्ञान और बच्चों को कौशल (Skill) नहीं मिला। मुआवजे की रकम का नशा उतरने के बाद आज हजारों परिवार अपनी ही मिट्टी पर बेगाने और कंगाल हो चुके हैं।