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पुरानी पेंशन पर हाईकोर्ट का प्रहार: ‘नेताओं को पेंशन तो फौजियों-कर्मचारियों को क्यों नहीं?’; 25 फरवरी तक सरकार से मांगा जवाब

​"पेंशन या सम्मान की लड़ाई? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूछा—नेताओं के लिए मलाई तो कर्मचारियों के लिए बाजार का जोखिम क्यों? 25 फरवरी को होगा बड़ा खुलासा"

पुरानी पेंशन (OPS) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक रुख। नेताओं और कर्मचारियों के बीच पेंशन के अंतर पर सरकार को फटकार। 25 फरवरी तक जवाब तलब।

प्रयागराज (The Asia Prime): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लेकर एक ऐसी टिप्पणी की है, जिसने देशभर के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। नई पेंशन योजना (NPS) को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने समानता के अधिकार पर कड़े सवाल उठाए हैं।

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हाईकोर्ट के वे 3 सवाल, जिन्होंने सरकार को घेरा

​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य और केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए पूछा:

  1. दोहरे मापदंड क्यों? यदि नई पेंशन योजना (NPS) इतनी ही लाभकारी और अच्छी है, तो इसे देश के सांसदों और विधायकों पर लागू क्यों नहीं किया गया?
  2. बाजार का जोखिम क्यों? कर्मचारियों की बिना सहमति के उनकी मेहनत की कमाई का पैसा शेयर मार्केट में किस आधार पर लगाया जा रहा है?
  3. गारंटी कहाँ है? 30-35 साल तक राष्ट्र की सेवा करने वाले कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद एक गरिमामय जीवन और निश्चित पेंशन की गारंटी क्यों नहीं मिल रही?

नेता बनाम फौजी: सम्मान और सुरक्षा की जंग

​कोर्ट में दलील दी गई कि एक नेता मात्र कुछ वर्षों की सेवा के बाद आजीवन पेंशन का हकदार बन जाता है, जबकि सीमाओं पर जान जोखिम में डालने वाले फौजी और दिन-रात व्यवस्था चलाने वाले कर्मचारियों को बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है।

  • नेताओं की स्थिति: आजीवन पेंशन, कोई निवेश जोखिम नहीं, वेतन आयोग के साथ बढ़ोत्तरी।
  • कर्मचारी/फौजी: 30+ साल की कठिन सेवा, परिवार की जिम्मेदारी, लेकिन रिटायरमेंट के बाद अनिश्चित भविष्य।

NPS पर कर्मचारियों की गंभीर आपत्ति

​याचिका में कहा गया कि NPS पूरी तरह से योगदान और बाजार की चाल पर आधारित है। महंगाई के इस दौर में फिक्स पेंशन न होना सामाजिक असुरक्षा को जन्म दे रहा है। कोर्ट ने भी माना कि लंबे समय की सेवा के बाद सम्मानजनक पेंशन देना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है, न कि कोई खैरात।

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25 फरवरी: फैसले की घड़ी

​हाईकोर्ट ने सरकार को 25 फरवरी 2026 तक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। सरकार को इन बिंदुओं पर जवाब देना होगा:

  • ​OPS लागू करने में वास्तविक व्यावहारिक कठिनाई क्या है?
  • ​नेताओं और कर्मचारियों के लिए अलग-अलग नियम होने का संवैधानिक आधार क्या है?
  • ​कर्मचारियों के भविष्य को बाजार जोखिमों से कैसे सुरक्षित किया जाएगा?

जनता की राय: आप क्या सोचते हैं?

​सोशल मीडिया पर इस खबर के आने के बाद OPS की मांग ने फिर से जोर पकड़ लिया है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं के बीच उन हाथों को भूल जाना सही है जिन्होंने इस विकास की नींव रखी है?

THE ASIA PRIME सर्वे:

नेताओं को पेंशन मिलती है, तो फौजियों और कर्मचारियों को पुरानी पेंशन क्यों नहीं?

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