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विशेष विश्लेषण: यासीन मलिक का ‘राजनीतिक एटम बम’, क्या दिल्ली के सफेदपोशों ने ही कश्मीर को सुलगता रखा?

यासीन मलिक के कोर्ट में खुलासे ने दिल्ली से श्रीनगर तक हड़कंप मचा दिया है। क्या कश्मीर का अलगाववाद सरकारी संरक्षण में फल-फूल रहा था? पढ़िए इस राजनीतिक एटम बम का पूरा विश्लेषण।”

नई दिल्ली (The Asia Prime): दिल्ली हाईकोर्ट के गलियारों से निकला एक बयान भारतीय राजनीति की बुनियाद हिलाने की ताकत रखता है। टेरर फंडिंग के मामले में उम्रकैद काट रहे कश्मीरी अलगाववादी यासीन मलिक ने खुद को फांसी से बचाने के लिए जो दलीलें दी हैं, वे केवल एक अपराधी का बचाव नहीं, बल्कि पिछले तीन दशकों की ‘कश्मीर नीति’ पर एक बड़ा सवालिया निशान हैं।

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राहुल के हाइड्रोजन बम बनाम मलिक का एटम बम

​एक तरफ जहां देश की मुख्यधारा की राजनीति में ‘हाइड्रोजन बम’ जैसे खुलासों के दावे अक्सर सुर्खियों के लिए किए जाते हैं, वहीं यासीन मलिक ने तिहाड़ जेल से एक ऐसा ‘राजनीतिक एटम बम’ फोड़ा है जिसकी गूंज दूर तक जाएगी। मलिक का दावा है कि वह महज एक चरमपंथी नहीं था, बल्कि उसे तत्कालीन सरकारों, खुफिया एजेंसियों (RAW/IB) और बड़े कॉर्पोरेट घरानों द्वारा एक “स्टेट-स्पॉन्सर्ड बैकचैनल” के रूप में इस्तेमाल किया गया।

क्या ‘कुटीर उद्योग’ बन गया था अलगाववाद?

​मलिक के आरोपों ने उस पुराने ‘नेक्सस’ की पोल खोल दी है, जिसे अक्सर कश्मीरी जनता से छुपाया गया।

विक्टिम कार्ड या डरावनी सच्चाई?

​यह सच है कि यासीन मलिक एक सजायाफ्ता मुजरिम है। उस पर वायुसेना के जवानों की हत्या और रूबिया सईद के अपहरण जैसे जघन्य कांड दर्ज हैं। कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि मलिक अब ‘विक्टिम कार्ड’ खेल रहा है ताकि वह यह साबित कर सके कि वह एक स्वतंत्र आतंकी नहीं बल्कि सिस्टम का एक ‘मोहरा’ था। फांसी के फंदे को सामने देख यह एक अपराधी की आखिरी छटपटाहट भी हो सकती है।

न्याय की कसौटी पर भारत की साख

​अब दिल्ली हाईकोर्ट के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ NIA की मांग है कि मलिक को “Rarest of Rare” श्रेणी में मृत्युदंड दिया जाए। वहीं दूसरी तरफ, मलिक के आरोपों ने उस ‘सिस्टम’ की जवाबदेही तय करने का मौका दिया है जिसने कश्मीर की आग में घी डालने का काम किया।

​देश अब यह देखना चाहता है कि क्या केवल मलिक को सजा मिलेगी या उन चेहरों को भी बेनकाब किया जाएगा जिन्होंने ‘शांति वार्ता’ के नाम पर देशद्रोह की बिसात बिछाई थी।

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